Wednesday, 7 March 2018

जल्ली कट्टु- पशु दौड़- क्या वैधानिक हैं – क्यों आवश्यक हैं – कैसे होनी चाहिए?


डॉ. श्रीकृष्ण मित्तल


मानव और प्राणियों के सम्बन्ध सभ्यता के प्रारंभ से जाने और देखे जाते हैं | भारतवर्ष में बैल को शिव वाहन नंदी के रूप में पूजा जाता है| बैल- सांड परिवहन, कृषि, यातायात, व् सेन्य उपयोगों में लाया जता है| सांडनी शब्द का प्रोग हमारे धार्मिक और एतिहासिक ग्रंथो में देखा जा सकता है. जो रथ में जोत कर सैंकड़ो कोस का सफ़र तय करती थी कितने ही वार्षिकोत्सव, रिवाज पुरातन काल से चले और मनाये जाते रहे हैं| गत कुछ वर्षों से स्वनामी प्राणी सेवकों ने प्राणी क्रूरता निवारण के नाम में शौर मचाना प्रारंभ किया हुआ है | आज इस विषय के अनुसंधान की आवश्यकता है 
पृथम प्रश्न उठता है की क्या यह पशु क्रीडा – दौड़ अवैधानिक हैं ?
जवाब एक बड़े ना में आता है | कानूनन इन प्राणी क्रीडा और दौड़ों पर कोई रोक नहीं है विशेषत: विभिन्न विधानों का पालन करते हुए अगर की जाती हैं | क्रूरता निवारण अधिनियम १९६० की  परफोर्मिंग धाराएं केवल पशु क्रीडा या दर्शन जिसमे जनता को शुल्क / टिकट विक्रय कर दाखिल किया जाता है| किसी भी धार्मिक या सामाजिक रीती रिवाज में टिकट नहीं लगायी जाती है इसलिए इन क्रीडा या दौड़ो पर उपरोक्त नियम लागु नहीं होते हैं| बैल – सांड कभी भी नॉन परफोर्मिंग एनिमल सूचि में नही थे जिस सूचि में शेर, चिता, आदि रखे गये थे | एक षड्यंत्र में ११.२.२०११ की अधिसूचना में बैल को इस सूचि में डाला गया  |
इस वैधानिक स्थिति को आदरणीय पंजाब उच्च न्यायालय ने CWP नो. 8548,8793 और 11088 -२०१२ में विचार किया और मान्य  किया
कितने बैल सांड इन दौड़ो में भाग लेते हैं ? राष्ट्रिय पशुगणना अनुसार गाय बैल, भैंस, भैंसा की संख्या लगभग ३० करोड़ है | पुरे देश में वर्ष भर में ५०-१०० दौड़ें विभिन्न धार्मिक उत्सवों पर की जाती हैं| हर दौड़ में २०-५० पशु भाग लेते हैं यानी सभी दौड़ो में संख्या १०,००० की संख्या पार नहीं करती जबकि इन स्वनामधन्य प्राणी रक्षक सेवको की आँखों के सामने से लगभग ९ करोड़ गौवंश क्रूरता की प्रकाष्टा पार करते हुए एक राज्य  से दुसरे राज्य पार करते हुए अंतर राष्ट्रीय सीमा भी पार करा दिया जा रहा है
भारतीय जंतु कल्याण बोर्ड के कर्नाटक- केरल प्रभारी के नाते मुझे काकुर जिला एअर्नाकुलम में एक बैलो की दौड़ देखने का अवसर प्राप्त हुआ था I यहाँ एक धार्मिक उत्सव के अवसर पर गत १५० वर्षो से दौड़ आयोजित की जाती है | बैलगाड़िया लगभग १-२ किलोमीटर तक दौडाई जाती हैं मैंने देखा की २०-२५ बैल दौड़ के लिए तैयार थे| केरल सरकार के पशु चिकित्सा अधिकारी और जिला पशु कल्याण अधिकारी उनके स्वास्थ्य जांच पर लगाये गए| उन्होंने पशु यातायात नियमो का उलंघन भी जांचा लेकिन सभी बैल स्वस्थ्य और ग्राम सीमा यानि ५ किलो मीटर के दायरे से लाये गए पाए गए| किसी भी वाहक के पास कोई कोड़ा, चाबुक डंडा आदि नही था| किसी भी प्रकार के मादक उतेजक द्रव्य का सेवन नही कराया पाया गया| क्योंकि मैंने किसी भी विधि विधान का उलंघन नहीं पाया तो उस दौड़ को देखना ही मेरा दायित्व था |
इस दौड़ के देखने के पश्चात् मैंने विषय का गहराई से अध्यन किया और पाया कि कुछ विदेशी और उनके भारतीय भागीदार भारतीय संस्कृति, शक्तिशाली कृषि नस्लों को समाप्त करने के षड्यंत्र में क्रूरता और इन दौड़ो को रोकने का शौर मचा रहे हैं | इस आशा के साथ की यह प्राणी दौड़ में जीतेगा तो उसका, उसके कुटुंब का और उसके ग्राम का मान बढ़ाएगा, वास्तव में इन दौड़ो में भाग लेने के लिए, जो की बड़े गौरव का विषय माना जाता है, पूर्णवर्ष उनकी देखभाल, सेवा और उच्चकोटि के खाद्य सेवन करवाता है  
गत कुछ वर्ष पूर्व जलीकट्टू पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रोक लगाये जाने पर तमिलनाडु में हज़ारो  स्वस्थ्य, अच्छी नस्ल के बैल विक्रय कर दिए गए और कसाईओं द्वारा काट दिए गए|
दो बैलों की जोड़ी के नेतृत्व में हमारी आज़ादी का संग्राम विजय हुआ और हमारे राष्ट्रिय चिन्ह में विद्यमान है वास्तव में आज खाने की और गौमांस निर्यात द्वारा विदेशी मुद्रा अर्जित करने  साधन बना दिया गया है |
PETA, PFA,HSI,WVS जैसी अंतर्राष्ट्रीय पशु कल्याण संस्थाओं जो की अपने को प्राणीरक्षक पेश करती हैं ने पूर्व सरकार से बैल  को वनप्राणी सूचि में २०११ में डलवा दिया जबकि बैल तो एक कृषिप्राणी है जो हमारी कृषि, परिवहन, सिचाई व् ग्रामीण कुटीर उद्द्योग  का आधार है| सत्य में यह एक बड़ा सोचा समझा देशद्रोही निर्णय था जिसे आज पुन: सोचा और ठीक करना पर्यावरण, वन व् जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की आवश्यकता है|
कुछ स्वनामधन्य प्राणीसहायक गरीब ग्वालो, ग्रामीण और देवस्थानो को तृस्त करते पाए जा रहे है| तमिलनाडु मुख्यमंत्री जी का श्री नरेंदर मोदी जी को इस विषय में लिखा पत्र आँख खोलने वालाहै |
क्या दौड़ होनी चाहिए? विभिन्न विचारो का मंथन कर नतीजा निकलता है कि यह धार्मिक प्राणी दौड़ अवश्य होनी चाहियें | स्वनामधन्य प्राणी सेवको ने जो तर्क इन दौड़ो को निरस्त करने को रखे हैं वोह इन दौड़ो को विभिन्न सघन जांच, अनुमति, और देख रेख में करके किसी भी प्रकार की अनुमानित क्रूरता, मानव हानि, को रोका जा सकता है  
कुछ सुझाव इस प्रकार हैं :-
१. दौड़ के संचालक, व्यवस्थापक दौड़ के स्थान, समय, भाग लेने वाले प्राणियों आदि की अग्रिम जानकारी अपने सपथपत्र कि कोई भी प्राणी राज्य और केन्द्रीय नियम के उलंघन में दौड़ में भाग नही लेगा, .जिला प्रशासन / राज्य जीव जंतु कल्याण बोर्ड, भारतीय जीव जन्तु कल्याण बोर्ड को देकर लिखित अनापति / अनुमति प्राप्त करें.
२. कोई उतेजक, औसधि, मादक पदार्थ पशु और मानव भागीदारो में नही पाया जायेगा |
३. कोई भी दंड, हंटर, कोड़ा दौड़ में प्रयोग में नहीं लाया जायेगा
४. दर्शको को दौड़ स्थल से सुरक्षित दुरी पर रखा जायेगा |
५. दौड़ से पूर्व और पश्चात् भारतीय जीवजन्तु कल्याण बोर्ड द्वारा नियुक्त चिकित्सक दल , अधिकारी निरक्षण करेंगे
भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड को देश में होने वाली विभिन्न दौड़ों का सही आकलन, उद्गम, पुरातनता, आवश्यकता आदि पर  एक राष्ट्रीय लेखा (रजिस्टर ) तैयार कर राष्ट्रिय निति निर्धारण करने का मंत्रालय को सुझाव देना चाहिए
इन परस्थितियों में माननीय सर्वोच्च न्यायालय को आश्वासन देकर की किसी भी प्राणी पर क्रूरता नहीं होने दी जाएगी, यह दौड़ें जरी रखने की अनुमति ले लेनी चाहिए, अन्यथा एक और राष्ट्रिय स्वभिमान, रीती रिवाज, ग्रामीण अस्मिता दूसरी और बहुत तेजी से घटती बैल प्रजाति को कसाईखाना उन्मुख बना देंगे |

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